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  • २१९ - रावण की सभा में विभीषण का आना

    रावण को विभीषण का समझाना और विभीषण का अपमान

    दोहा :
    * सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
    राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥37॥

    भावार्थ:-मंत्री, वैद्य और गुरु- ये तीन यदि (अप्रसन्नता के) भय या (लाभ की) आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं (ठकुर सुहाती कहने लगते हैं), तो (क्रमशः) राज्य, शरीर और धर्म- इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है॥37॥

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Krishna Kutumb
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