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  • २२० - रावण और विभीषण संवाद

    चौपाई :
    * सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
    अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥1॥

    भावार्थ:-रावण के लिए भी वही सहायता (संयोग) आ बनी है। मंत्री उसे सुना-सुनाकर (मुँह पर) स्तुति करते हैं। (इसी समय) अवसर जानकर विभीषणजी आए। उन्होंने बड़े भाई के चरणों में सिर नवाया॥1॥

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Krishna Kutumb
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