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  • २२२ - रावण और विभीषण संवाद

    * चौदह भुवन एक पति होई। भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
    गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥4॥

    भावार्थ:-चौदहों भुवनों का एक ही स्वामी हो, वह भी जीवों से वैर करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है) जो मनुष्य गुणों का समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता॥4॥

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