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  • २२६ - रावण और विभीषण संवाद

    * ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
    देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥3॥

    भावार्थ:-वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइए। वे श्री रघुनाथजी शरणागत का दुःख नाश करने वाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर) को जानकीजी दे दीजिए और बिना ही कारण स्नेह करने वाले श्री रामजी को भजिए॥3॥

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Krishna Kutumb
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