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  • २३३ - रावण और विभीषण संवाद

    * तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
    कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥4॥

    भावार्थ:-आपके हृदय में उलटी बुद्धि आ बसी है। इसी से आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मान रहे हैं। जो राक्षस कुल के लिए कालरात्रि (के समान) हैं, उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है॥4॥

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