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  • २३४ - रावण और विभीषण संवाद

    दोहा :
    * तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
    सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हारा॥40॥

    भावार्थ:-हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ)। कि आप मेरा दुलार रखिए (मुझ बालक के आग्रह को स्नेहपूर्वक स्वीकार कीजिए) श्री रामजी को सीताजी दे दीजिए, जिसमें आपका अहित न हो॥40॥

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