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  • २४१ - विभीषण का भगवान श्री रामजी की शरण के लिए प्रस्थान

    * रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
    चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥2॥

    भावार्थ:-रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव (ऐश्वर्य) से हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित होकर मन में अनेकों मनोरथ करते हुए श्री रघुनाथजी के पास चले॥2॥

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Krishna Kutumb
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