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  • २४३ - प्रभु श्री राम जी का वर्रण

    * देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
    जे पद परसि तरी रिषनारी। दंडक कानन पावनकारी॥3॥

    भावार्थ:-(वे सोचते जाते थे-) मैं जाकर भगवान्‌ के कोमल और लाल वर्ण के सुंदर चरण कमलों के दर्शन करूँगा, जो सेवकों को सुख देने वाले हैं, जिन चरणों का स्पर्श पाकर ऋषि पत्नी अहल्या तर गईं और जो दंडकवन को पवित्र करने वाले हैं॥3॥

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