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  • २४४ - प्रभु श्री राम जी का वर्रण

    * जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
    हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥4॥

    भावार्थ:-जिन चरणों को जानकीजी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपटमृग के साथ पृथ्वी पर (उसे पकड़ने को) दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात्‌ शिवजी के हृदय रूपी सरोवर में विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हीं को आज मैं देखूँगा॥4॥

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