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  • २४ ८ - श्री राम जी और विभीषण का संवाद

    * कह प्रभु सखा बूझिए काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
    जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥3॥

    भावार्थ:-प्रभु श्री रामजी ने कहा- हे मित्र! तुम क्या समझते हो (तुम्हारी क्या राय है)? वानरराज सुग्रीव ने कहा- हे महाराज! सुनिए, राक्षसों की माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलने वाला (छली) न जाने किस कारण आया है॥3॥

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Krishna Kutumb
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