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  • २४९ - वानरों का विभीषण पर संखा

    * भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
    सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥4॥

    भावार्थ:-(जान पड़ता है) यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है, इसलिए मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाए। (श्री रामजी ने कहा-) हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी, परंतु मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना!॥4॥

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