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  • २५२ - श्री राम जी का कथन

    चौपाई :
    * कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
    सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥1॥

    भावार्थ:-जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं॥1॥

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