Loading...

  • २५५ - श्री राम जी का कथन

    * जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
    जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥4॥

    भावार्थ:-क्योंकि हे सखे! जगत में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभर में उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण आया है तो मैं तो उसे प्राणों की तरह रखूँगा॥4॥

    |0|0
Krishna Kutumb
ब्लॉग सूची 0 0 प्रवेश
Open In App