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  • २५७ - दोनों भाइयों को विभीषणजी ने दूर ही से देखा

    चौपाई :
    * सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
    दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥1॥

    भावार्थ:-विभीषणजी को आदर सहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणा की खान श्री रघुनाथजी थे। नेत्रों को आनंद का दान देने वाले (अत्यंत सुखद) दोनों भाइयों को विभीषणजी ने दूर ही से देखा॥1॥

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