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  • २५ ८ - विभीषणजी का मंत्र मुग्ध हो जाना

    * बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
    भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥2॥

    भावार्थ:-फिर शोभा के धाम श्री रामजी को देखकर वे पलक (मारना) रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गए। भगवान्‌ की विशाल भुजाएँ हैं लाल कमल के समान नेत्र हैं और शरणागत के भय का नाश करने वाला साँवला शरीर है॥2॥

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Krishna Kutumb
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