Loading...

  • २६० - श्री राम जी और विभीषण संवाद

    * नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
    सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥4॥

    भावार्थ:-हे नाथ! मैं दशमुख रावण का भाई हूँ। हे देवताओं के रक्षक! मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लू को अंधकार पर सहज स्नेह होता है॥4॥

    |0|0
Krishna Kutumb
ब्लॉग सूची 0 0 प्रवेश
Open In App