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  • २६४ - श्री राम जी और विभीषण संवाद

    * बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
    अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥4॥

    भावार्थ:-हे तात! नरक में रहना वरन्‌ अच्छा है, परंतु विधाता दुष्ट का संग (कभी) न दे। (विभीषणजी ने कहा-) हे रघुनाथजी! अब आपके चरणों का दर्शन कर कुशल से हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है॥4॥

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Krishna Kutumb
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