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  • २६७ - श्री राम जी का वर्रण

    चौपाई :
    * तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
    जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥1॥

    भावार्थ:-लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभी तक हृदय में बसते हैं, जब तक कि धनुष-बाण और कमर में तरकस धारण किए हुए श्री रघुनाथजी हृदय में नहीं बसते॥1॥

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