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  • २७४ - श्री राम जी का कथन

    * सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
    समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥3॥

    भावार्थ:-इन सबके ममत्व रूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है। (सारे सांसारिक संबंधों का केंद्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है॥3॥

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