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  • २७ ८ - विभीषण का रामजी के चरण कमलों को पकड़ना

    * सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
    पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥2॥

    भावार्थ:-प्रभु की वाणी सुनते हैं और उसे कानों के लिए अमृत जानकर विभीषणजी अघाते नहीं हैं। वे बार-बार श्री रामजी के चरण कमलों को पकड़ते हैं अपार प्रेम है, हृदय में समाता नहीं है॥2॥

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Krishna Kutumb
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