Loading...

  • २७९ - श्री राम जी और विभीषण संवाद

    * सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
    उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥3॥

    भावार्थ:-(विभीषणजी ने कहा-) हे देव! हे चराचर जगत्‌ के स्वामी! हे शरणागत के रक्षक! हे सबके हृदय के भीतर की जानने वाले! सुनिए, मेरे हृदय में पहले कुछ वासना थी। वह प्रभु के चरणों की प्रीति रूपी नदी में बह गई॥3॥

    |0|0
Krishna Kutumb
ब्लॉग सूची 0 0 प्रवेश
Open In App