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  • १८ १ - श्री राम जी और विभीषण संवाद

    * जदपि सखा तव इच्छा नहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
    अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥5॥

    भावार्थ:-(और कहा-) हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगत्‌ में मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नहीं जाता)। ऐसा कहकर श्री रामजी ने उनको राजतिलक कर दिया। आकाश से पुष्पों की अपार वृष्टि हुई॥5॥

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Krishna Kutumb
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