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  • १८ ७ - समुद्र पार करने के लिए विचार

    * कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
    जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥4॥

    भावार्थ:-विभीषणजी ने कहा- हे रघुनाथजी! सुनिए, यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रों को सोखने वाला है (सोख सकता है), तथापि नीति ऐसी कही गई है (उचित यह होगा) कि (पहले) जाकर समुद्र से प्रार्थना की जाए॥4॥

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Krishna Kutumb
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