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  • २९० - समुद्र पार करने के लिए विचार

    * नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
    कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥2॥

    भावार्थ:-(लक्ष्मणजी ने कहा-) हे नाथ! दैव का कौन भरोसा! मन में क्रोध कीजिए (ले आइए) और समुद्र को सुखा डालिए। यह दैव तो कायर के मन का एक आधार (तसल्ली देने का उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं॥2॥

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