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  • राम जी के सेना का वर्रण

    * अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
    नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥2॥

    भावार्थ:-हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रण में न जीत सके॥2॥

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Krishna Kutumb
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