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  • राम जी के सेना का वर्रण

    चौपाई :
    * राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
    सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥1॥

    भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धि की अधिकता को लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते हैं, परंतु नीति निपुण श्री रामजी ने (नीति की रक्षा के लिए) आपके भाई से उपाय पूछा॥1॥

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