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  • रावण का हँसना

    * तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
    सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥2॥

    भावार्थ:-उनके (आपके भाई के) वचन सुनकर वे (श्री रामजी) समुद्र से राह माँग रहे हैं, उनके मन में कृपा भी है (इसलिए वे उसे सोखते नहीं)। दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा (और बोला-) जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है!॥2॥

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Krishna Kutumb
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