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  • लक्ष्मणजी का पत्र देना

    चौपाई :
    * सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
    भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥1॥

    भावार्थ:-पत्रिका सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, परंतु मुख से (ऊपर से) मुस्कुराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा- जैसे कोई पृथ्वी पर पड़ा हुआ हाथ से आकाश को पकड़ने की चेष्टा करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करता है (डींग हाँकता है)॥1॥

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Krishna Kutumb
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