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  • शुक का सभा से जाना

    * नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
    करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥5॥

    भावार्थ:-वह भी (विभीषण की भाँति) चरणों में सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्री रघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और श्री रामजी की कृपा से अपनी गति (मुनि का स्वरूप) पाई॥5॥

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Krishna Kutumb
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