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  • समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध

    * अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
    संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥3॥

    भावार्थ:-ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक (अग्नि) बाण संधान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी॥3॥

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Krishna Kutumb
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