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  • समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध

    * मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
    कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥4॥

    भावार्थ:-मगर, साँप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया॥4॥

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