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  • समुद्र का श्री राम जी से विनती

    * एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
    सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥3॥

    भावार्थ:-इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप के राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिए। कृपालु और रणधीर श्री रामजी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात्‌ बाण से उन दुष्टों का वध कर दिया)॥3॥

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