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  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
    ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥११- ५४॥

    परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ॥54॥

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Krishna Kutumb
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