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  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
    अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥१२- ९॥

    यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर॥9॥

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Krishna Kutumb
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