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  • भगवान का चिन्तन

    श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्-
    ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
    ध्यानात्कर्मफलत्यागस्-
    त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२- १२॥

    मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग (केवल भगवदर्थ कर्म करने वाले पुरुष का भगवान में प्रेम और श्रद्धा तथा भगवान का चिन्तन भी बना रहता है, इसलिए ध्यान से 'कर्मफल का त्याग' श्रेष्ठ कहा है) श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है॥12॥

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Krishna Kutumb
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