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  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
    विविक्तदेशसेवित्व-
    मरतिर्जनसंसदि ॥१३- १०॥

    मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना 'अव्यभिचारिणी' भक्ति है) तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना॥10॥

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Krishna Kutumb
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