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  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
    पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥१३- २०॥

    कार्य (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम 'कार्य' है) और करण (बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्‌, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा- इन 13 का नाम 'करण' है) को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है॥20॥

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Krishna Kutumb
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