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  • अव्यभिचारी भक्तियोग

    मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
    स गुणान्समतीत्यैतान्-
    ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१४- २६॥

    और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं) द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है॥26॥

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Krishna Kutumb
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