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  • दैवासुर-सम्पद्विभागयोग

    दैवासुरसम्पद्विभागयोगः

    श्रीभगवानुवाच -
    अभयं सत्त्वसंशुद्धि-
    र्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
    दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥१६- १॥

    दैवासुर-सम्पद्विभागयोग

    श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता॥1॥

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