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  • मन और इन्द्रियों द्वारा अनुभव

    अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
    स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥१७- १५॥

    जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम 'यथार्थ भाषण' है।) तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है॥15॥

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