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  • अनिश्चित फलवाला

    सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
    क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥१७- १८॥

    जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित ('अनिश्चित फलवाला' उसको कहते हैं कि जिसका फल होने न होने में शंका हो।) एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है॥18॥

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Krishna Kutumb
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