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  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
    दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥१७- २१॥

    किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक (जैसे प्रायः वर्तमान समय के चन्दे-चिट्ठे आदि में धन दिया जाता है।) तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में (अर्थात्‌ मान बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए अथवा रोगादि की निवृत्ति के लिए।) रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है॥21॥

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Krishna Kutumb
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