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  • श्रीभगवानुवाच

    श्रीभगवानुवाच -
    काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
    सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥१८- २॥

    श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं॥2॥

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