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  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
    कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥१८- ६॥

    इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है॥6॥

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