Loading...

  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
    विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥१८- १४॥

    इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है) एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है॥14॥

    |0|0