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  • क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म

    न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
    सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥१८- ४०॥

    पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो॥40॥

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Krishna Kutumb
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