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  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
    सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥१८- ४८॥

    अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म (प्रकृति के अनुसार शास्त्र विधि से नियत किए हुए वर्णाश्रम के धर्म और सामान्य धर्मरूप स्वाभाविक कर्म हैं उनको ही यहाँ स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावज कर्म, स्वभावनियत कर्म इत्यादि नामों से कहा है) को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं॥48॥

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Krishna Kutumb
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