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  • शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा

    सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
    इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥१८- ६४॥

    संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा॥64॥

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    शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा