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  • श्री कृष्णा भगवान ने अर्जुन से कहा

    इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
    न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥१८- ६७॥

    तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए॥67॥

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