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श्रीमद्भगवद्गीता के सर्वश्रेष्ठ अध्याय कौन से हैं? क्यों?

भगवद्गीता के अट्ठारह अध्यायों में ज्ञान तथा पुण्य की दृष्टि से कौन सा एक अध्याय सर्वश्रेष्ठ हैं ?और क्यों?

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  • Shiv Das

    श्रीमद्भगवद्गीता में 18वाँ अध्याय ज्ञान और पुण्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हैं।क्योंकि श्रीकृष्ण जी इन्हें अपना चरण मानते हैं और हरिभक्तों को चरण सर्वाधिक प्रिय होता है ,इन अध्याय का नाम मोक्षसंन्यास योग है अर्थात इनका ज्ञान मोक्ष का भी त्याग करा देता है मोक्ष से ऊँचा भक्ति होता है सच्चा भक्त केवल आराध्य की सेवा करना चाहता है जबकि मोक्ष संसार चक्र से मुक्ति का नाम है मोक्ष प्राप्त व्यक्ति भक्ति नहीं करते उन्हें इनकी आवश्यकता नहीं होती।जैसे सभी नदियों में गंगाजी,पांडवों में अर्जुन,यदुवंशियों में कृष्ण,एकादश रूद्रों में महारुद्र शंकर,शब्दों में एक अक्षर ॐ श्रेष्ठ हैं वैसे ही सभी अध्यायों में अठारहवाँ अध्याय श्रेष्ठ है।सबसे बड़े ज्ञान होने के कारण इनका माहात्म्य(महिमा,पुण्य)भी बड़ा है। भक्तजन गीता पढ़ने हेतु प्रेरित हों तथा गीता के विषय में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करें इसी उद्देश्य से मैंने यह प्रश्न किया मैं कोई विद्वान नहीं कृपया इसे मेरे द्वारा अपनी विद्वता सिद्ध करने की चेष्टा न समझें सभी हरि दासों तथा शिव दासों को मेरी ओर से सहस्र कोटि नमन प्रभु हम सब पर सदैव अपनी कृपा बनाये रखें।शिव शिव शिव

  • Dharmanand Mahapatra

    श्लोक
    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।
    श्लोक कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।
    अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

    सर्वश्रेस्ठ इसलिए क्योंकि ..
    भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकर अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

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